Ziyarat E Nahiya In Hindi Site

ज़ियारत-ए-नाहिया (Ziyarat e Nahiya) इस्लामी इतिहास और रूहानियत में एक बेहद ख़ास और दिल को छू लेने वाली दुआ है। यह ज़ियारत इमाम-ए-ज़माना (अतफ़श) की तरफ़ से मंसूब है, जिसमें उन्होंने कर्बला के शहीदों और ख़ास तौर पर इमाम हुसैन (अलेहिस्सलाम) पर हुए अत्याचारों का ज़िक्र किया है। हिंदी भाषी मुसलमानों और अहले-बैत के चाहने वालों के लिए इस पाक ज़ियारत को समझना और पढ़ना अपनी आस्था को मज़बूत करने का एक बड़ा ज़रिया है।

मुहर्रम-उल-हराम का महीना आते ही कर्बला के मातम की लहर पूरी दुनिया में दौड़ जाती है। हर शिया-ए-अली (अ.स.) इस दौरान इमाम हुसैन (अ.स.) के मजलिसों में रोता है और उनके दर्द को समझने की कोशिश करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी ज़ियारत (पवित्र प्रार्थना) भी है, जिसे खुद चौथे इमाम, इमाम ज़ैन-उल-आबिदीन (अ.स.) ने कर्बला के मैदान में मौजूद न होते हुए भी पढ़ा था? यही है "ज़ियारत-ए-नाहिया" ।

इस्लामी विद्वानों और हदीस की किताबों के अनुसार, ज़ियारत-ए-नाहिया के दो मुख्य रूप (वर्जन) मिलते हैं:

इसमें इमाम हुसैन (अ) के घोड़ों (ज़ुल्जनाह) का ख़ाली ख़ेमे की तरफ़ लौटना, बीबियों का विलाप करना और इमाम के ज़ख़्मी बदन पर घोड़ों के दौड़ाए जाने का ऐसा ज़िक्र है जो रूह को कंपा देता है। 3. अत्याचारियों पर लानत ziyarat e nahiya in hindi

अल्लाह की प्रशंसा के साथ जो स्वामी है दीनों (धर्मों) का, और उसकी मदद चाहता हूँ उस चीज़ में जो आदेश देता है दुनिया के मामलात में, और उस पर भरोसा रखता हूँ जो उसने अपनी पवित्र इच्छा के अनुसार निश्चित किया है।

यह ज़ियारत मुख्य रूप से इमाम हुसैन (अ.स.) और कर्बला के शहीदों को समर्पित है

"सलाम हो आदम पर जो अल्लाह के चुने हुए हैं। सलाम हो नूह पर जिनकी दुआ कुबूल हुई। सलाम हो इब्राहिम पर जो अल्लाह के खलील (मित्र) हैं। सलाम हो हुसैन पर जिन्होंने अपनी जान अल्लाह की राह में कुर्बान कर दी।" जिसे खुद चौथे इमाम

यह ज़ियारत केवल ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण नहीं है, बल्कि यह कई गूढ़ आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश देती है:

: इसकी शुरुआत में आदम (अ.स.) से लेकर पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.व.) तक कई नबियों को सलाम भेजा जाता है गहरा शोक

ज़ियारत-ए-नाहिया का इतिहास और प्रामाणिकता इस दिन के दिन

"मैं आपकी बैअत करता हूं, इस दिन के दिन, जिस दिन मैं जीवित हूं..." यह घोषणा है कि ज़ायर इमाम के मिशन से जुड़ा है और उनके दुश्मनों से बेरी है।

यदि आप इस ज़ियारत के किसी विशिष्ट भाग का या शब्द-दर-शब्द अर्थ जानना चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं ताकि मैं आपकी सहायता कर सकूं। Share public link

इमाम ज़माना (A.S.) इसमें इमाम हुसैन (A.S.) की प्यास, उनकी शहादत के वक़्त की ज़ख्मों, और उनके अहले-बैत (परिवार) की बेबसी का सजीव चित्रण करते हैं .

इसे पढ़ने से हमारे मौजूदा इमाम के प्रति हमारी वफ़ादारी और मोहब्बत गहरी होती है।

Reciting these lines connects the believer to the historical sacrifice:

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